कौन उगा सका है इसपे फसलें अमन की,
सियासत की ज़मीं है बंजर,दिखता नही था,
है मुजरिमों के हाथ में हाकिम का गिरेबान,
पहले तो ऐसा मंज़र दिखता नही था,
चेहरे को सजा के रखा था बाजारू लालियों से,
अन्दर से जिस्म था ज़र्ज़र दिखता नही था,
ज़ख्मों पे मरहम लगाने का फ़र्ज़ था जिनका,
उस हाथ में था खंजर ,दिखता नही था...
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