Friday, April 1, 2011

यकीं कर

ख्वाबों पे यकीं कर अपनी ख्वहिश पे यकीं कर,

खुद पे ऐतबार , अपनी कोशिश पे यकीं कर,

तपती हुयी राहों में कभी राहत तो मिलेगी,

उम्मीद के हैं बादल तू बारिश पे यकीं कर,

वक़्त का हर लफ्ज़ तेरी मौसिक़ी में ढलेगा,

लगा ले सुर और खुद की बंदिश पे यकीं कर,

है सूरत कामयाबी की तेरे तस्सवुर के माफिक,

कायनात की इस खुबसूरत साजिश पे यकीं कर,,

हौसले अगर हो जाएँ कभी तेरे मायूस,

किस्मत से हिम्मत की इस रंजिश पे यकीं कर,


Thursday, April 1, 2010

यूँ ही..

यूँ तो मुझे तुमसे कोई नाराज़गी नहीं,
पर अब मेरी वफाओं में वो ताजगी नहीं,

तन्हाई के इस शहर में आ के बस गया हूँ मैं,
मेरी फितरतों में अब वो आवारगी नहीं,

इबादतों ने भी अपनी कुछ आदतें बदली हैं,
अब उनमे कहीं सजदों की अदायगी नहीं

तुम को खोने की कसक भी कम सी हो गयी,
रौनक है लबों पर कोई बेचारगी नहीं,

ख्वाबों को सुला दो किसी और निगाह में तुम ,
नींदों में मेरी पहले सी अब दीवानगी नहीं,

Wednesday, May 6, 2009

कौन उगा सका है इसपे फसलें अमन की,

सियासत की ज़मीं है बंजर,दिखता नही था,


है मुजरिमों के हाथ में हाकिम का गिरेबान,

पहले तो ऐसा मंज़र दिखता नही था,


चेहरे को सजा के रखा था बाजारू लालियों से,

अन्दर से जिस्म था ज़र्ज़र दिखता नही था,


ज़ख्मों पे मरहम लगाने का फ़र्ज़ था जिनका,

उस हाथ में था खंजर ,दिखता नही था...